Tuesday, November 27, 2018

केदारनाथ, बद्रीनाथ की यात्रा 2018 भाग 3 KEDARNATH, BADRINATH YATRA 2018 PART 3

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रात में जल्दी सो जाने के कारण, सुबह होने के पहले ही रात में करीब दो बजे मेरी नींद खुल गई। मैंने दुबारा सोने की कोशिश की पर मुझे नींद नहीं आई, तब मैंने सोचा की बाथरूम तो एक ही है सभी लोग एक साथ उठेंगे तो फ्रेश होने और नहाने में दिक्कत होगी। मुझे अब नींद नहीं आ रही थी तो मैं बाथरूम में गया और फ्रेश हो कर ब्रश भी कर लिया।
मौसम काफी ठंडा था और होटल वाला गर्म पानी देता या नहीं ये भी पता नहीं था। नलके से जो पानी आ रहा था वो काफी ठंडा था, इसलिए नहाने की हिम्मत नहीं पड़ी तो मैं हाथ मुँह धो के बाथरूम से बाहर आ गया। बाहर आके देखा तो तिवारी जी भी उठ गए थे। वो भी बाथरूम में घुस गए और बाहर आये तो नहा धोकर तैयार थे। फिर बारी बारी से सब लोग नहा लिए।  सबकी देखा देखी मुझे भी हिम्मत आई और लगे हाथ मैंने भी नहा लिया। सुबह के  पांच बजे हम अपने कमरे से बाहर निकल कर सड़क पर थे।


यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने का काम कल ही हो गया था तो हम अब  हम गौरीकुंड जाने के लिए बिलकुल तैयार थे। सोनप्रयाग से गौरीकुंड की दूरी 5 किलोमीटर की है। टैक्सी स्टैंड पर एक जीप खड़ी दिखी, हम उसके पास गए तो उसने बताया कि जब पूरी सवारियां हो जाएंगी तभी वो गौरीकुंड के लिए निकलेगा। अब इतनी सुबह वो भी यात्रा का ऑफ सीजन 15 सवारियां कब आती। हमने उससे हमें तुरंत ले जाने को कहा तो ड्राइवर ने कहा कि आप 15 सवारियों के पैसे दे दीजिए मैं तुरंत ही चल पडूंगा। 20 रूपये प्रति सवारी के हिसाब से 300 रूपये होते थे। इतना तो हम रात में भी देने को तैयार थे तो हम तुरंत ही मान गए। हमारी किस्मत अच्छी थी की उसी समय तीन यात्री और आ गए, अब हमारा किराया 240 रूपये हो गया। भोलेनाथ का जायकारा लगा के हमारी यात्रा शुरू हो गई।

सोनप्रयाग से गौरी कुंड तक चढाई ही है। करीब पंद्रह बीस मिनट बाद  हम गौरीकुंड में थे। जहाँ सोनप्रयाग में सुबह के समय चाय नास्ते की सारी दुकाने बंद थी, वही गौरीकुंड में सारी दुकाने खुली थी। एक चाय की दुकान पर हमने भी डेरा डाल दिया और मैगी का आर्डर दे दिया। हमारे सहयात्री राजीव भाई ने एक बार फिर अपनी कलाकारी दिखाई और हमारे लिए बढ़िया चाय बना डाली। मैगी और चाय का नाश्ता करके हम दुकान से बाहर निकले और बाबा के दरबार की तरफ बढ़ चले। मैं, गौतम, अजय जी और राजीव जी एक साथ चल रहे थे, तिवारी जी दिखाई नहीं दिए तो हमने सोचा की वो थोड़ा आगे निकल गए होंगे और आगे कही हमारा इंन्तजार कर रहे होंगे। गौरी कुंड से आगे बढ़ने पर करीब आधे किलोमीटर तक सीढ़ियों का रास्ता बना हुआ है। इन सीढ़ियों के शुरुआत में ही गर्म पानी के कुंड तक जाने का रास्ता है जहाँ हर मौसम में गर्म पानी आता रहता है, इसी कुंड के वजह से इस जगह का नाम गौरीकुंड पड़ा है। बहुत से यात्री यहाँ नहा रहे थे। हम तो होटल में ही नहा चुके थे तो हम आगे बढ़ चले। 

सीढ़ियों के दोनों तरफ होटल और दुकाने थी। जब सीढ़िया ख़त्म हो गई तो हम रुक गए और हमारी नजरे तिवारी जी को ढूंढने लगी पर तिवारी जी हमें कही नहीं दिखे। हम सबने अपने अपने मोबाइल से उनको फ़ोन किया पर उनका नंबर नॉट रिचेबल बता रहा था। अब हमें उनकी चिंता होने लगी मन में तरह तरह के ख्याल आने लगे। हम करीब दस पंद्रह मिनट वही रुक के उनका इंतजार करने लगे। हमें लगा की तिवारी जी गौरीकुंड में ही कही हमारा इंन्तजार तो नहीं कर रहे है, अपनी इस शंका को मिटाने के लिए मैंने वापस गौरी कुंड जाने का फैसला लिया। इतनी मुश्किल से तो वो सीढ़िया मैंने चढ़ी थी अब फिर नीचे जाना और वापस ऊपर आना ये सोच कर ही मुझे ठण्ड में पसीना आ गया, पर जाना तो था ही मैं ऊपर से नीचे आया और पूरे रास्ते मेरी नजरें तिवारी जी को ढूंढती रही। उन्हें ढूंढते ढूंढते मैं उस दुकान पर पहुँच गया जहाँ हमने नास्ता किया था, पर तिवारी जी कही नहीं मिले।

अब मैं फिर से सीढ़ियों की खड़ी चढाई चढ़ के अपने हमराहियों के पास पहुंचा पर तिवारी जी अब भी हमारे साथ नहीं थे। हमने एक संभावना और निकाली क़ि लगता है तिवारी जी आगे चले गए होंगे, तो अब हमें भी आगे बढ़ना चाहिए। मन में अनेक प्रकार की शंकाओं को ले कर हम आगे बढ़ चले और इस बीच मोबाइल से लगातार उनको फ़ोन मिलाया जाता रहा पर नतीजा वही ढाक के तीन पात  'दिस नंबर इज नॉट रिचेबल' निकलता रहा।

केदारनाथ समुद्र तल से लगभग 11755 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। यह द्वादस ज्योतिर्लिगों में से एक है। गौरीकुंड से केदारनाथ के रास्ते में केवल और केवल चढाई ही है। 2013 की विनाशलीला से पहले यह रास्ता 14 किलोमीटर का हुआ करता था पर नया रास्ता थोड़ा घुमावदार होने के कारण गौरीकुंड केदारनाथ मार्ग की लंबाई में इजाफा हो गया है और अब यह रास्ता 16 किलोमीटर का हो गया है। कुछ दूर की चढ़ाई करने के बाद ही केदारनाथ पर्वत के दर्शन होने लगते है। बर्फ से ढके उस पहाड़ को देख कर ये पता लग जाता है कि बाबा केदार नाथ जी का मंदिर इन्ही पहाड़ो के नीचे कही होगा। रास्ते के एक तरफ ऊँचे पहाड़ थे तो दूसरी तरफ मन्दाकिनी नदी अपनी ही धुन में हर हर की आवाज के साथ बहती चली जा रही थी, मानो हमें ये कह रही थी की जिस तरह मैं लगातार बहती हुई अनेक राज्यो को पार करती हुई अपनी मंजिल बंगाल की खाड़ी तक चली जाती हूं, उसी तरह तुम भी लगातार चलते रहो तुम भी अपनी मंजिल बाबा केदारनाथ के पास पहुँच जाओगे।

जंगल चट्टी जो गौरीकुंड से चार किलोमीटर की दूरी पर है यहाँ तक तो हम सभी साथ साथ ही चल रहे थे पर अब अजय जी और राजीव जी दोनों हमसे आगे निकल गए थे, और मैं और गौतम पीछे रह गए थे। गौतम का ये पहला ट्रैकिंग का अनुभव था तो वो थोड़ा थक सा गया था और वो हर दस कदम चलने के बाद साँस लेने के लिए रुक जाता था। गौतम मेरे बचपन का मित्र है तो मैं उसके साथ ही चल रहा था और उसका हौसला भी बढ़ा रहा था। रास्ते में दो तीन जगह रुक कर हमने फ्रूटी भी पी। फ्रूटी में काफी ग्लूकोज होता है जो शरीर को तुरंत ताकत प्रदान करता है। 

रास्ते में छोटे बड़े अनेक झरने भी दिखाई दिए जहाँ हमने रुक के कुछ फोटो भी लिए। रास्ते में छोटी मोटी अनेक दुकाने भी थी जहाँ खाने पीने की अनेक वस्तुएं उपलब्ध थी। रास्ते में जगह जगह अस्थाई शौचालय भी बने हुए थे। 2013 की विभीषिका के बाद रास्ता भी नया बना हुआ था जिन पर नदी की तरफ रेलिंग भी बनी हुई थी। प्रकृति के सुन्दर नजारो का आनंद लेते हुए हम भीमबली तक आ पहुँचे जो गौरीकुंड से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर है। हम यहाँ थोड़ी देर बैठ कर आसमान को निहारने लगे। यात्रा का ऑफ़ सीजन होने के कारण यात्रियो की आवाजाही काफी कम थी। चारो तरफ एक सन्नाटा सा पसरा हुआ था, इस सन्नाटे को फाटा से आने वाले हेलीकाप्टरों की गड़गड़ाहट दूर कर रही थी। यहाँ से मैंने एक बार फिर तिवारी को फ़ोन किया। इस बार सारे ग्रह नक्षत्र हमारे साथ थे तो फ़ोन मिल गया। तिवारी जी ने बताया कि वो तो लिंचौली पहुँच गए है और हमारा इंन्तजार कर रहे है। लिंचौली गौरीकुंड से किलोमीटर ग्यारह किलोमीटर और भीमबलि से चार किलोमीटर की दूरी पर है। मैंने अनुमान लगाया कि तिवारी जी हमसे एक घंटे की दूरी पर है। मैंने उनसे कहा कि आप हम लोगो का इंतजार कीजिये हम लोग जितनी जल्दी हो सके आपके पास पहुचने का प्रयास करेंगे।

तिवारी जी से बात करके मुझे बहुत संतोष हुआ की वो ठीक ठाक है और इसके साथ ही मन में उठ रही अनेक शंकाओं पर विराम भी लग गया। भीमबली से एक किलोमीटर आगे जाने पर हमें मन्दाकिनी नदी पर दो पुल दिखाई दिए और यहाँ रास्ता दो भागों में बटा हुआ था। हमने एक दुकानदार जो चाय और समोसे बेच रहा था, से इन रास्तो के बारे में पूछा तो उसने बताया कि इस जगह को रामबाड़ा ब्रिज कहा जाता है और दोनों रास्ते लिंचौली से होते हुए केदारनाथ मंदिर तक जायेंगे। हमें भूख भी लग आई थी तो हमने वहाँ एक एक समोसे खाये समोसे बिलकुल ही बेस्वाद थे पर इतनी दुर्गम जगह पर जो मिल जाये वो ठीक ही है। अब तक हम लगभग आठ किलोमीटर चल चुके थे, अब तक का रास्ता चढाई के मामले में ठीक ठाक ही था, पर यहाँ से बाक़ी के आठ किलोमीटर की चढाई काफी कठिन थी। दुकानदार ने बताया कि पहले रास्ता नदी के इसी किनारे से था और इस जगह को रामबाड़ा कहा जाता था पर 2013 की आपदा में रामबाड़ा का अस्तित्व ही समाप्त हो जाने के कारण नया रास्ता नदी के दूसरे किनारे पर बनाया गया है और ये दोनों ब्रिज नदी पार करने के लिए ही बनाये गए है। 

रामबाड़ा ब्रिज से  आगे बढ़ने पर चढ़ाई की तीव्रता में अचानक से बहुत ज्यादा वृद्धि हो गई। एक किलोमीटर चलने के बाद नीचे देखने पर रामबाड़ा ब्रिज बहुत ही छोटा सा नजर आ रहा था। मुझे गौरीकुंड केदारनाथ मार्ग का ये भाग सबसे कठिन लगा। इस कठिन चढाई के बाद गौतम की हालत ख़राब होने लगी। वो मुझसे बार बार कही बैठने को कहता और मैं उसे थोड़ी देर आराम करने देता और फिर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता। मैंने उससे घोड़ा कर लेने को कहा पर उसने मना कर दिया। धीरे धीरे पर लगातार चलते हुए हम लिंचौली पहुँच गए जहाँ तिवारी जी हमारी राह देख रहे थे। अजय जी और राजीव जी भी वहाँ बैठे हमारा ही इंन्तजार कर रहे थे। लिंचौली में हमने एक एक पैकेट चिप्स खाये और एक एक फ्रूटी पी।

अब हम नदी के दूसरे किनारे पर बने रास्ते पर चल रहे थे। यहाँ से पुराना रूट और उस पर हुए विनाशलीला के निशान भी स्पष्ट नज़र आ रहे थे। पुराना रास्ता कही कही ठीक था तो कही कही पूरी तरह से बाढ़ में बह गया था। हम केवल इस बात की कल्पना मात्र  से ही सिहर गए की जिस दिन यहाँ मन्दाकिनी ने अपना रौद्र रूप दिखाया होगा उस दिन यहाँ वास्तव में क्या हुआ होगा। 2013 की घटना के बाद बहुत से लोगो ने कहा कि अब यात्रा बहुत असुरक्षित हो गई है पर मैं NIM (नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ़ मॉन्टनेरिंग) का धन्यवाद् करना चाहूंगा जिन्होंने रास्ते को पहले से भी सुरक्षित और शानदार बना दिया है। अजय जी और राजीव जी एक बार फिर हमसे आगे निकल गए । अब मैं, गौतम और तिवारी जी साथ साथ चल रहे थे। यहाँ से काफी ऊंचाई पर केदारनाथ बेस कैंप दिखाई पड़ रहा था जो लिंचौली से 4 किलोमीटर की दूरी पर था। ये 4 किलोमीटर भी एक दम सीधी चढाई वाले थे। इन चार किलोमीटर ने शरीर का बचा खुचा दम भी निकल दिया। इसी बीच किसी यात्री ने बताया कि केदारनाथ मंदिर के कपाट तीन बजे बंद हो जायेंगे और पुनः पांच बजे शाम में खुलेंगे। 

हमारा लक्ष्य था कि हम तीन बजे के पहले दर्शन करके वापस सोनप्रयाग पहुँच जायेंगे और सोनप्रयाग से सुबह बद्रीनाथ की यात्रा के लिए प्रस्थान करेंगे, पर ढेड़ बज चुके थे और हम मंदिर से अभी भी तीन किलोमीटर दूर थे। तीन बजे कपाट बंद होने की जानकारी ने हमें एक अनोखे से उत्साह से भर दिया और हम दोगुने जोश से केदारनाथ की तरफ बढ़ चले। केदारनाथ बेस कैंप तक पहुचते पहुँचते गौतम की हालत एक दम ख़राब हो चुकी थी। वो एक जगह बैठ गया तब मैंने तिवारी जी से कहा कि आप आगे बढ़िए मैं इसे धीरे धीरे लेके आता हूं और मैं भी गौतम के पास बैठ गया।

आगे:-केदारनाथ,बद्रीनाथ की यात्रा 2018 भाग 4
         
                               (क्रमशः)

गौरीकुंड में मैग्गी और चाय का लुफ्त उठाते गौतम जी।

यात्रा की शुरुआत हो गई।

रास्ते में एक झरना।

एक और झरना साथ में जलपान की दुकान।

जंगल चट्टी।

इसके बारे में क्या कहना

मार्ग को पानी के कटान से बचाने के लिए पत्थरो को जाली में बांध कर रखा गया था।

पूरा रास्ता ऐसे मनोहारी दृश्यो से भरा पड़ा था।

कुछ स्थानीय बच्चे।

सुरक्षित यात्रा के लिये मार्ग पर लगी रेलिंग।

एक विशाल जल प्रपात।

दिल को खुश करने वाले नज़ारे और दूर दिखता केदारनाथ पर्वत।

इसी बर्फीले पहाड़ की गोद में है बाबा केदारनाथ का मंदिर।

फोटो में 2013 की विनाशलीला के सबूत।

दाहिने तरफ ज़ूम करके देखने पर केदारनाथ बेस कैंप दिखाई देगा।

7 comments:

  1. वो जो आपका बाथरूम वाला कांसेप्ट है न कि बाथरूम तो एक ही है सब एक साथ जाएंगे तो तकलीफ होगी...में अपने आलसपन में हमेशा इसे प्रयोग करता हु और सबसे आखरी उठता हु....आखिर तिवारी जी मिल गए....बढ़िया विवरण...

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  2. आपका केदारनाथ का यात्रा लेख अच्छा लगा..... तिवारी जी आखिर मिल ही गये.... फोटो काफी छोटी लगाई आपने ..चाहे तो इन्हें बड़ा कर सकते है .... बाकी अच्छा लगा

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  3. धन्यवाद प्रतिक जी।

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  4. धन्यवाद् रितेश जी।

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  5. साथी को साथ लेकर चलने वाली आपकी बात वाकई तारीफ के काबिल है

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  6. जब कोई आप के कहने पर आपके साथ चल देता है तो वो आप की जिम्मेदारी बन जाता है। अगर कोई गैर भी होता तो भी मैं उसे बीच रास्ते में नहीं छोड़ता। यहाँ तो मामला बचपन की दोस्ती का था।

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  7. बद्रीनाथ 2000 से अधिक वर्षों से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है और मंदिर में बौद्ध वास्तुशिल्प प्रभाव से पता चलता है कि बद्रीनाथ भी बहुत शुरुआती समय से बौद्धों द्वारा वंदित थे। तीर्थ के निकट तप्तकुंड का गर्म पानी का झरना है, जिसमें तीर्थयात्री श्री बद्रीनाथ धाम की पूजा करने से पहले डुबकी लगाते हैं।

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